Causes, Symptoms and Types of Dengue or Breakbone fever



Dengue or breakbone fever: The dengue is a mosquito-borne tropical disease. Of dengue every year worldwide thousands of people die. The disease occurs more often in the rainy season and months just after it.

Causes of Dengue fever:
The  primarily cause of dengue fever is  due to Aedes (Aedes Ajeypti)  mosquito bites. When the mosquito bites the patient of dengue it sucks the blood through which the dengue virus is transmitted to the mosquito and the virus seems to flourish.  When this mosquito bites a healthy person it transmit the dengue virus to the person’s body and the symptoms of dengue fever could be seen after 4 to 5 days.The Aedes mosquito mostly bites in the day time.

Symptoms:
• Fever
• Headache
• Muscle and joint aches
• Rashes on the face, neck and chest
• Vomiting and diarrhea

Dengue is mainly of three types

1. Classical dengue fever: common symptom of classical dengue fever are
• Sudden fever and feeling cold
• muscles pain
• Red and pink rashes on the face, neck and chest
• Feeling weak
• Eyes and sore throat pain
Classical dengue can be treated at home.

डेंगू या हड्डीतोड़ बुखार, इसके लक्षण एवं प्रकार




डेंगू या हड्डीतोड़ बुखार: यह एक मच्छर जनित डेंगू वायरस के संक्रामण के कारण होने वाली महामारी है। डेंगू से हर साल दुनिया भर मे हजारो लोग मर जाते है। यह रोग ज़्यादातर बरसात तथा उसके बाद के कुछ महीनो मे ज्यादा होता है।

कारण:
डेंगू मुख्य रूप से एडीज(एडीज एजेयपति  )  मच्छर के काटने से फैलता है। जब यह मच्छर किस डेंगू के रोगी को काटता है ओर उसका खून चूसता है तो यह वायरस मच्छर के शरीर मे प्रवेश कर जाता है तथा वही पनपने लगता है । जब यह मच्छर किस स्वस्थ व्यक्ति को काटता है तो डेंगू वायरस मच्छर की लार के माध्यम से उस व्यक्ति के शरीर मे प्रवेश कर जाता है तथा 4 से 5 दिन के बाद उस  व्यक्ति के अंदर डेंगू बुखार के लक्षण नज़र आने लगते है। डेंगू का मच्छर घर के आस पास इकट्ठा पानी मे पैदा होता है। यह मच्छर ज़्यादातर साफ पानी मे ही पैदा होता है। डेंगू का मच्छर ज़्यादातर दिन मे काटता है।

लक्षण :                  

  •   बुखार    
  •  सिर दर्द 
  • मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द 
  • चेहरे, गर्दन तथा छाती पर लाल चकत्ते(रैश) 
  •   उल्टी तथा दस्त
डेंगू मे मुख्यत खून मे मौजूद प्लेटलेट्स कम हो जाते है तथा तेज़ बुखार तथा मांसपेसियों एवं जोड़ो मे दर्द होने लगता है।  
डेंगू मुख्य रूप से तीन प्रकार का होता है

ग्वारपाठा(अलोएवेरा),मुसब्बर वेरा

हिंदी नाम: ग्वारपाठा, घी-कुमार।

संस्कृत नाम: घृत-कुमारी, दीर्घा-पत्र, कुमारी कन्या।

अँग्रेजी नाम: इंडियन अलोए(Indian aloe), जाफराबाद अलोए(Jafarabad aloe), बर्बादस अलोए(Barbadas aloe)

फैमिली: लिली(lilly)।

संरचना:
हम ग्वारपाठा के विषय मे गहराई मे जाने से पहले  इसकी आधारभूत संरचना  के विषय मे बात करते है ताकि हर कोई आसानी से इसके बारे मे सही जानकारी प्राप्त कर सकेदुनिया भर मे ग्वार पाठा की  300 से अधिक प्रजातियों है जिनमे से केवल चार  मनुष्य के लिए उपयोगी होती है
ग्वारपाठा का पौधा सामान्य रूप से है ऊंचाई में 80-100 सेमी चला जाता है। इसके पत्ते जड़ से मोटे तथा सिरो पर नुकीले होते है। ग्वारपाठा का पत्ता अन्दर से गुद्देदार होता है ओर लगभग 96% हिस्सा रसीला होता हैग्वारपाठा रसीला होने के कारण शुष्क क्षेत्र मे भी उग जाता है इसे जीवित रहने के लिए कम पानी की जरूरत होती है।

ग्वारपाठा के पत्ते के चार भाग होते है:
छिलका: यह बाहरी सुरक्षा परत है। यह हरे रंग का होता है 
 रस या क्षीर: यह पीले रंग का कड़वा तरल पदार्थ होता है जो जानवरो से इसकी रक्षा करता है
 लासा या श्लेष्मक: यह पत्ती का भीतरी हिस्सा है।
 गुद्दा: यह भी आंतरिक हिस्सा है। ये हिस्सा पूरा गुद्देदार होता है।
घटक: ग्वारपाठा एक नहीं बल्कि कई सारे विटामिन, एंजाइमों, खनिज और फैटी एसिड से भरा है। इनमे से 75 से अधिक सक्रिय तत्व है जो मानव शरीर के लिए बहुत उपयोगी होते हैं। हमारे शरीर को 20 एमिनो एसिड की जरूरत होती है जिनमे से 19  अकेले ग्वारपाठा में मौजूद हैं। मानव शरीर  केवल 12 प्रकार के एमिनो एसिड बनाने के लिए सक्षम है। अन्य आठ प्रकार के ऐमिनो एसिड हम भोजन के माध्यम से प्राप्त करते हैं। ये सब महत्वपूर्ण 7-8 अमीनो एसिड हम ग्वारपाठा से हासिल कर सकते हैं जो हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी है।

तुलसी एवं इसके विभिन्न प्रकार



तुलसी या पवित्र तुलसी को दुनिया भर एक औषधीय पौधे के रूप में जाना जाता है। यह एशिया के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र पाया जाता है और ज्यादातर भारत में इसकी खेती की जाती है। तुलसी को बीज से उगाया जाता है और इसके लिए अच्छी मिट्टी और धूप वाले मौसम की जरूरत होती है। तुलसी के पौधे  ऊंचाई में 4-5 फुट तक बढ़ सकते हैतुलसी को दुनिया भर के सभी जड़ी बूटियों की रानी के रूप में जाना जाता है। तुलसी को कई नामों से जाना जाता है:

वैज्ञानिक नाम: ओकीमुम संकटुम(ocimum sanctum), ओकीमुम टेनुइफ़्लोरूम(ocimum tenuiflorum), ओकीमुम ग्राटिस्सिमुम (ocimum gratissimum)।

वानस्पतिक परिवार: लामियाकेए(Lamiaceae)(टकसाल)।

श्री रामा तुलसी, कृष्ण या श्यामा तुलसी और वन तुलसी: आयुर्वेद में तीन बुनियादी नाम।

संस्कृत नाम: तुलसी, सुरसाह, अजका, पर्णासा, मंजरी, हरिप्रिया, भूताग्नि

देवी के रूप में नाम: लक्ष्मी, सीता, राधा।

रामा तुलसी: यह तुलसी का सबसे आम प्रकार है। रामा तुलसी के पत्ते हरे, बैंगनी तना एवं सफेद-बैंगनी फूल होते है। तुलसी के पौधे इस प्रकार का मुख्य रूप से औषधीय प्रयोजन के लिए प्रयोग किया जाता है।

कृष्णा या श्यामा तुलसी: श्यामा तुलसी के फूल, पत्ते तथा तना सभी भाग बैंगनी रंग के होते हैं। तुलसी के इस प्रकार को मूल रूप से पूजा के लिए प्रयोग किया जाता है।

वन तुलसी: वन तुलसी के पत्ते तथा तना हरे होते हैं और इसके फूल सफेद होते हैं। इसकी पत्तियां रामा एवं श्यामा तुलसी की  तुलना में ज्यादा बड़े,चौड़े एवं नुकीले होते है